न जाने क्यों

न जाने क्यों मैं चल रहा हूँ।

हार का सफ़र अनोखा,
असत्य को देता हूँ मौका।
जीवन की इस जंग में
अरसे से मैं जल रहा हूँ।
न जाने क्यों मैं चल रहा हूँ।

अभी जीत में अंतर बड़ा है,
सामने पूरा विश्व खड़ा है।
मन ही मन में डर रहा हूँ।
न जाने क्यों मैं चल रहा हूँ।

अस्तित्व का वह विश्व है कहाँ,
सफलताओं की शाख है जहाँ।
दिन-ब-दिन विफल रहा हूँ।
न जाने क्यों मैं चल रहा हूँ।

विश्व – मैं जब एक हैं,
क्यों साथ नहीं प्रत्येक है।
अद्भुत विश्व में पल रहा हूँ।
न जाने क्यों मैं चल रहा हूँ।

आरम्भ-अंत अंतराल में,
जब आत्म से मैं कह सकूँ कि
अब जाना, क्यों मैं चल रहा हूँ।
तब तक तो मन यही कहेगा,
न जाने क्यों मैं चल रहा हूँ।


– मंगलम् तिवारी (Mangalam Tiwari)


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