मृत्यु

नाम उसका मृत्यु है।

सृष्टि के प्रारम्भ में
आकाश, तारों से भी पहले
सर्वप्रथम आविष्कार था
नाम उसका मृत्यु है।

जीवन के आरंभ में
गृहत्याग करने पर गर
हार का जो भाव था
नाम उसका मृत्यु है।

स्वप्न की पहचान में
कई वक्त से चलता ही जाऊँ
हर मोड़ पर जब हार पाऊँ
नाम उसका मृत्यु है।

विफलताओं के क्रम चक्र में
अपनों के प्रश्नों पर जब
कुछ भी मैं ना बोल पाऊँ
नाम उसका मृत्यु है।

प्रश्नों के क्रम चक्र में
अपने ही प्रश्नों में उलझकर
खुद को ही मैं भूल जाऊँ
नाम उसका मृत्यु है।

संपूर्ण रहस्य का ज्ञान लेकर
निरंतरता के महामंत्र को
जब भी मैं अपना न पाऊँ
नाम उसका मृत्यु है।

अपने ही अस्तित्व की
खोज में हूँ मैं भटकता
पर नहीं कहीं जब खोज पाता
नाम उसका मृत्यु है।

सूर्य के अस्तित्व जैसा
मेरा भी अस्तित्व होता
गर नहीं ये मान पाता
नाम उसका मृत्यु है।

स्वयं अंत के बाद जब
पुनर्जन्म की अवधारणा को
जो नहीं मैं जान पाऊँ
नाम उसका मृत्यु है।

संपूर्ण सिद्धि की कामना में
अपने को ही भूलकर जब
अपनों के मैं पास जाऊँ
नाम उसका मृत्यु है।

पथ प्रदर्शक मार्ग दर्शक
को खोजना अनुचित नहीं
पर आत्म दर्शक ना खोज पाऊँ
नाम उसका मृत्यु है ।

कर्मज्ञान का सार साधना
जय-पराजय की वजह जो
भाग्य या ईश्वर को मानूँ
नाम उसका मृत्यु है।

शून्य अब मैं हो चला हूँ
शून्यता पर ही टिका हूँ
जो शून्य को आभिशाप मानूँ
नाम उसका मृत्यु है।

पुनः स्वप्न का प्रश्न आता
मैं अब भी कुछ नहीं जानता हूँ
पर स्वप्न की जो राह छोडूँ
नाम उसका मृत्यु है।

– मंगलम् तिवारी ( Mangalam Tiwari)


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