विश्व शांति

​वृक्ष से मैं प्राण भरता
ब्रम्हाण्ड का आव्हान् सुनता।
वृहद पृथ्वी को देखकर मैं
वृहद बडा विचार करता।

ये कैसी शिक्षा कैसी दीक्षा
पृथ्वी की कैसी परीक्षा।
परमात्मा मुझको दे ये भिक्षा
क्या है शिक्षा, क्या है शिक्षा।

अभियांत्रिकी या यांत्रिकी
शिक्षा है किस प्रांत की।
ब्रम्हाण्ड ने अब गर्जना की
मैं बात करता शांति की।

अर्थ कैसे समझ पाता
मन में फिर एक प्रश्न आता।
ब्रम्हाण्ड की इस गर्जना से
उठी मन में गंभीर गाथा।

शांति का तात्पर्य क्या है?
भला इसका आश्चर्य क्या है?
गर यही शिक्षा का नाम है तो
संपूर्ण जग में सामर्थ्य क्या है?

कैसे इसको सीख पाऊँ?
कैसे प्रायोगिक बनाऊँ?
माँ पृथ्वी का मैं दु:ख मिटाऊँ
आतंक मुक्त अब इसे कराऊँ।

पाप की हद हो चुकी अब
घोर कलयुग नाम है।
मानवता ही रो रही
जिसमें लगा पूर्ण विराम है।

गंभीर मेरे प्रश्न से
करूण पृथ्वी भी गंभीर होती।
ब्रम्हाण्ड के अनंत से अब
आ रही आध्यात्म ज्योति।

सूर्य के भी पार दूर
ब्रम्हाण्ड से हूँकार थी ये।
करूण पृथ्वी की इस दीनता पर
ब्रम्हाण्ड की पुकार थी ये।

ऐ महान्! मेरे पुत्र! सुन
मन में तेरे रख जुनून।
शांति और संगीत में ही
सजती परमात्मा की धुन।

शांति का तात्पर्य कहता
प्रत्येक कण में प्राण रहता।
पवन और पानी के संग
प्रत्येक क्षण परमात्मा बहता।

संपूर्ण सृष्टि एक है
एक ही से सबका नाता।
अशुद्ध अंग कटता नहीं
शरीर को पर है मिटाता।

विशाल काया को बचालो
अशुद्ध अर्थ अशांति है।
वेद भी कहता रहा
शुद्ध मन ही शांति है।

हिंसा को सब छोड दो
अहिंसा पथ सम्मान है।
आतंक से मुख मोड लो
शांति पथ पर प्राण है।

मैं इसलिए ये कह रहा हूँ
क्यों कि प्रतिबिंब मेरा शांति है।
प्रतिबिंब गर नहीं बन सका
प्रतिक्रिया तब क्रांति है।

राम सीता को बचाये
नारी अब सम्मान चाहे।
पाप और आतंक से
निर्भया कब न्याय पाये।

माँ मैं भी अब हैरान हूँ
माँ तू भी अब हैरान है।
निर्भया कोई और नहीं
ये तेरी ही संतान है।

माँ पृथ्वी अब तो रो रही
कहा, बहुत परेशान हूँ।
संतान का दु:ख है मुझे
पर संतान से लाचार हूँ।

ये धरती अब आव्हान करती
संतान मुझ पर वार करती।
संतान के इस वार से
मेरी ही संतान मरती।

पृथ्वी की संतान रोए
कैसे पुत्र महान सोये।
माँ पृथ्वी अब ये कह रही है
जिसने अनगिनत है प्राण खोये।

सहिष्णुता की सब राग करते
पर असहिष्णुता की आग भरते।
ये दुष्ट दानव कौन है?
जो नहीं मेरा सम्मान करते।

ना मैं दौलत माँगती हूँ
ना मैं शोहरत माँगती हूँ।
मेरा तो सम्मान यही बस
मैं तो शांति चाहती हूँ।

सूर्य के भी पार दूर
ब्रम्हाण्ड भी हैरान है।
हवा की लहरें कह रही
यही शिक्षा विज्ञान है।

चेहरे पर मुस्कान लाता
परमात्मा से मैं कह रहा हूँ।
शांति पथ पर पग बढाता
शांति विश्व में रह रहा हूँ।

यही है शिक्षा, यही है दीक्षा
ना ही ये अभियांत्रिकी
ना ही है ये यांत्रिकी।
ये ब्रम्हाण्ड की ही गर्जना है
जो बात करता शांति की
जो बात करता शांति की।।

– मंगलम् तिवारी (Mangalam Tiwari)

Advertisements

4 thoughts on “विश्व शांति

Leave a Reply

Please log in using one of these methods to post your comment:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s